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क्यों दूर होते जा रहे हैं नेपाल और भारत ?

बीते महीने नेपाल ने भारतीय करंसी के 200, 500 और 2000 के नए नोट प्रतिबंधित कर दिए हैं.

नेपाल ने एक कड़ा कदम उठाते हुए भारतीयों के लिए देश में किसी भी तरह की नौकरी के लिए वर्क परमिट अब ज़रूरी कर दिया है. नेपाल के लेबर एंड ऑक्यूपेशनल सेफ्टी डिपार्टमेंट ने आदेश जारी करते हुए बताया है कि हम जानना चाहते हैं कि कितने भारतीय नेपाल में काम कर रहे हैं. एक ही महीने पहले नेपाल ने भारत की नई करेंसी के चलन पर भी रोक लगा दी थी और बीते कुछ सालों से लगातार उसका रुख भारत के खिलाफ होता नज़र आ रहा है.
वर्क परमिट हुआ ज़रूरी
अब नेपाल में भारतीय कामगारों को बिना परमिट के काम करने की इजाजत नहीं होगी. दरअसल, नेपाल सरकार ने वहां पर उद्योगों, कंपनियों और अन्य संस्थानों में काम करने वाले भारतीय नागरिकों के लिए वर्क परमिट अनिवार्य कर दिया है. नेपाल के श्रम और व्यावसायिक सुरक्षा विभाग ने बुधवार को देशभर में अपने दफ्तरों को आदेश जारी करते हुए कहा कि देश के अलग-अलग सेक्टर्स में काम करने वाले सभी भारतीय कामगारों के वास्तविक संख्या बताने के लिए कहा है.

विभाग के आदेश में कहा गया है, ‘कंपनियों में भारतीय वर्करों की जांच करके अपडेट कर दिया जाएगा और अगर उनके पास वर्क परमिट नहीं होगा तो संस्थान को बता दिया जाएगा कि वे इनका वर्क परमिट ले लें.’ अभी तक भारत और नेपाल में विशेष संधि के तहत भारतीय नागरिकों को नेपाल में और नेपाली नागरिकों को भारत में काम करने के लिए किसी तरह के परमिट की जरूरत नहीं पड़ती थी.

2015 की नाकेबंदी से रिश्ते हुए खराब

बता दें कि साल 2015 में नेपाल ने नया संविधान लागू किया था. ये संविधान 20 सितंबर को जारी हुआ और 21 सितंबर की रात से ही नेपाल की नाकेबंदी कर दी गई. नेपाली जनता ने इसे नाराज़गी में उठाया गया भारत सरकार का कदम माना. हालांकि, भारत सरकार का कहना था कि संविधान से असंतुष्ट मधेसी जनता ने यह कदम उठाया है.

बता दें कि सितंबर 2015 में भारत सरकार के विदेश सचिव जयशंकर ने नेपाल जाकर प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलकर ये कहा था कि जब तक मधेस जनता नाराज़ है तब तक संविधान लागू करने का काम टाल दिया जाना चाहिए. कुछ बीजेपी नेताओं ने नेपाल के संविधान से ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द निकालने का भी सुझाव दिया था जिस पर नेपाली पीएम प्रचंड ने ध्यान नहीं दिया था.
नाकेबंदी के दौरान के पी ओली नेपाल के पीएम थे, जो कि भारत के काफी करीबी माने जाते हैं. लेकिन मोदी सरकार ने उनकी अपील पर भी ध्यान नहीं दिया और नेपाल में नाकेबंदी से महंगाई आसमान छूने लगी थी. इसी के बाद ओली सरकार ने चीन से मदद मांगी और चीन ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया भी.

जुलाई 2016 में नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए ओली की सरकार गिरा दी और प्रचंड ने पीएम बनते ही भारत का दौरा किया. नेपाल में इससे ये संदेश गया कि भारत ने सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई है. इसके बाद 2017 में नेपाली जनता ने वाम गठबंधन को जिताकर ओली को फिर पीएम बना दिया.

बिम्सटेक में मिले, लेकिन दिया झटका
नेपाली पीएम और भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी की 2018 बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन) सम्मलेन में मुलाक़ात हुई, लेकिन इसके बाद ही नेपाल ने फिर भारत को झटका दे दिया…

बता दें कि बिम्सटेक भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड, भूटान और नेपाल का एक क्षेत्रीय समूह है. पहले नेपाल ने बिम्सटेक देशों के पुणे में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया और इसके ठीक बाद 17 से 28 सितंबर तक चीन के साथ 12 दिनों का सैन्य अभ्यास किया. बाद में नेपाल ने स्पष्ट किया कि चीन के साथ सैन्य अभ्यास करने का कदम आंतरिक राजनीति कारणों के चलते उठाया गया है लेकिन ओली सरकार दो तिहाई बहुमत वाली है ऐसे में ये सिर्फ एक बहाना ही नज़र आया.
चीन से बढ़ रही है दोस्ती
बता दें कि चीन और नेपाल के बीच बीते तीन सालों में लगातार सहयोग बढ़ रहा है और नेपाल भारत से सहयोग ख़त्म करता जा रहा है. असल में भारत नेपाल के नए संविधान से संतुष्ट नहीं था. कहा जा रहा था कि नेपाल ने मधेसियों के साथ नए संविधान में भेदभाव किया है. मधेसी भारतीय मूल के हैं और इनकी जड़ें बिहार और यूपी से हैं. हालांकि नेपाल ने संविधान में कोई बदलाव नहीं किया और भारत को नाकेबंदी बिना कोई कामायाबी के ख़त्म करनी पड़ी थी.

उधर, नेपाल के वाणिज्य मंत्रालय को चीन ने थिंयान्जिन, शेंज़ेन. लिआनीयुगैंग और श्यांजियांग पोर्ट के इस्तेमाल की अनुमति दे दी थी. इसके अलावा नाकेबंदी के दौरान चीन ने नेपाल को लैंड पोर्ट लोंजोऊ, लासा और शिगैट्से के इस्तेमाल पर भी सहमति देकर नेपाली जनता में काफी वाहवाही बंटोरी थी. इसके बाद साल 2017 में आई बाढ़ के दौरान भी चीन ने नेपाल को 10 लाख डॉलर की मदद दी थी.

नेपाल के नए संविधान पर भारत के असंतोष पर नेपाल की ओली सरकार कहती रही है कि यह उसका आंतरिक मामला है. इसके आलावा भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि को लेकर ओली का रवैया भी सख्त रहा है. नेपाल का मानना है कि ये संधि अब नेपाल के हक में नहीं है. इस संधि के ख़िलाफ़ ओली नेपाल के चुनावी अभियानों में भी बोल चुके हैं.
ओली चाहते हैं कि भारत के साथ यह संधि ख़त्म हो. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी एक बड़ा मुद्दा है. सुस्ता और कलपानी इलाक़े को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है. दोनों देशों के बीच सुस्ता और कलपानी को लेकर विदेश सचिव के स्तर की बातचीत पर सहमति भी बानी थी.

नाकेबंदी और नोटबंदी!
नाकेबंदी ने नेपाली जनता को प्रत्यक्ष तौर पर नुकसान पहुंचाया था जिससे भारत के खिलाफ नाराज़गी बढ़ गई थी. नंवबर 2016 में मोदी सरकार ने अचानक से 500 और एक हज़ार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया तो नेपाल भी इससे काफी प्रभावित हुआ. नेपाल में भारत के नोट भी आम चलन में थे लेकिन नोटबंदी से नेपाल की अर्थव्यस्था पर भी बुरा असर हुआ. नेपाल ने भारत से पुराने नोटों को बदलने का आग्रह किया था.

ओली ने भारत दौरे में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अप्रैल 2018 में साफ़ कहा कि भारतीय निवेशक दुनिया भर के देशों में निवेश कर रहे हैं, लेकिन नेपाल को लेकर काफी नकारात्मक हैं. हम भौगोलिक रूप से पास में हैं, आना-जाना बिल्कुल आसान है, सांस्कृतिक समानता है और ऐसा सब कुछ है, जो दोनों देशों को भाता है फिर भी निवेश क्यों नहीं होता ? बता दें कि बीते महीने नेपाल ने भारतीय करंसी के 200, 500 और 2000 के नए नोट प्रतिबंधित कर दिए हैं.

क्या कहते हैं नेपाली नेता
बीती 26 जनवरी को भारत आए वरिष्ठ नेपाली नेताओं के एक समूह ने संदेश जारी कर कहा था कि भारत और नेपाल को एक-दूसरे के मुद्दों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और आपसी हित के मामलों में आगे बढ़ने के लिए सहयोग करना चाहिए. इन नेताओं ने ज़ोर दिया था कि दोनों देशों के संबंधो को लेकर जारी ईपीजी रिपोर्ट को लागू किया जाना चाहिए. नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व वित्त मंत्री रामशरण महत ने कहा कि द्विपक्षीय संबंध नेपाल में आर्थिक समृद्धि लाने में सहायक होने चाहिए. पूर्व विदेश मंत्री प्रकाश चंद्र लोहानी ने कहा कि भारत-नेपाल के बीच पर्याप्त संभावनाएं और अवसर हैं जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

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