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विवाहेतर संबंधों पर ये रिपोर्ट कहीं शादीशुदा जिंदगी में जहर तो नहीं घोल देगी!

अमेरिका की मिसौरी स्टेट यूनिवर्सिटी की डॉ. एलीसिया वॉकर द्वारा किए गए अध्ययन में 10 में से सात लोगों ने विवाहेतर संबंधों को अपनी शादीशुदा जिंदगी के लिए अच्छा बताया है।

 दुनिया में विवाहेतर संबंधों को बहुतेरे लोग अपनी खुशी की एक अहम वजह मान रहे हैं। एक अध्ययन से यह बात सामने आई है। डेटिंग वेबसाइट ‘एश्ले मेडिसन’ के जरिये अमेरिका की मिसौरी स्टेट यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्री डॉ. एलीसिया वॉकर द्वारा किए गए इस अध्ययन में पता चला है कि 10 में से सात लोगों ने विवाहेतर संबंधों को अपनी शादीशुदा जिंदगी के लिए अच्छा बताया है।

कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने अडल्टरी लॉ को रद कर बेवफाई को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए समाज के लिए एक नई राह खोली थी। पिछले साल सितंबर में इस संबंध में पुराने कानून को यह कहते हुए खारिज किया गया था कि अंग्रेजों के जमाने में बने और हाल तक चले आ रहे ऐसे कानूनों का आज की तारीख में कोई औचित्य नहीं रह गया है। इसका मतलब यह हुआ कि किसी पुरुष द्वारा विवाहित महिला से यौन संबंध बनाना अनैतिक भले हो पर इसे अपराध नहीं माना जाएगा।

बहरहाल इस डेटिंग वेबसाइट का मुख्य काम विवाहित और रिलेशनशिप में रह रहे जोड़ों के लिए डेटिंग की सुविधा मुहैया कराना है। इसलिए इस वेबसाइट से आए नतीजे ज्यादा हैरानी नहीं पैदा करते हैं। पर जब एक यूनिवर्सिटी की विद्वान सर्वेक्षण करके इसमें शामिल लोगों से पूछती है कि शादीशुदा जिंदगी से बाहर किसी और से संबंध बनाने के बाद उनके ‘जीवन की संतुष्टि’ पर क्या असर पड़ा और इसके जवाब में ज्यादातर लोग विवाहेतर संबंध को बेहतर जीवन के लिए अच्छा बताते हैं तो इस पर आश्चर्य ही होता है। सर्वेक्षण में शामिल महिलाएं पुरुषों से ज्यादा अपने विवाहेतर संबंधों की वजह से ज्यादा खुश बताई गईं।

बेवफाई और खुशी में संबंध स्थापित करने का काम सिर्फ इसी सर्वेक्षण आधारित शोध अध्ययन में नहीं हुआ है, बल्कि हाल में ‘पब्मेड’ नामक जर्नल में कहा गया है कि जो लोग किसी से अफेयर करते हैं, लेकिन इसकी जानकारी अपने पार्टनर को नहीं देते, वे ज्यादा खुश रहते हैं। क्या शादीशुदा जिंदगी की समस्याओं से निपटने का यह समाधान बनने लगा है कि लोग गुपचुप ढंग से विवाहेतर रिश्ते कायम करें। विवाहेतर संबंध केवल एक पश्चिमी अवधारणा नहीं है, बल्कि इंटरनेट आदि की बदौलत अब हमारा समाज भी जीवनसाथी से बेवफाई के मामले में पश्चिमी समाजों से होड़ लेने लगा है।

रिश्तों में टूटन की वजह हमारी जिंदगी में भागदौड़ का बढ़ना हो सकता है। टीवी, मोबाइल, इंटरनेट की दुनिया ने हमें स्वाभाविक रिश्तों से विमुख करते हुए आभासी रिश्तों की तरफ मोड़ दिया है। ऐसे में वास्तविक रिश्तों का बासीपन लोगों को जल्दी ही परेशान करने लगता है। अब तो बेवफाई के मामले में यह मांग भी उठने लगी है कि इसमें सजा का मामला एकतरफा क्यों रहे। यानी अगर मर्द विवाहेतर संबंध बनाता है तो समाज के साथ कानून भी उसे कठघरे में खड़ा करता है, लेकिन ऐसा करने पर स्त्री क्यों बचे। ऐसा एक विचार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने भी आ चुका है कि व्यभिचार, विवाहेतर संबंध के मामलों में औरत को बख्शा न जाए, बल्कि उसके मर्द के बराबर दोषी ठहराने की व्यवस्था बने।

इसमें संदेह नहीं कि हमारे देश के पारंपरिक समाजों में परिवार को अहम स्थान दिया गया है। विवाह के बाद सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वजहों से बहुत सी शादियां टूटते-टूटते रह जाती हैं। थोड़ा-बहुत डर कानून का भी है, जिनकी वजह से परिवार टिके हुए हैं। लेकिन इनमें भी जब बेवफाई के किस्से सामने आते हैं और ऐसे मामलों में मर्दो को दोषी पाए जाने पर सजा भी दी जाती है। लेकिन परिवार नामक संस्था को इतनी ज्यादा अहमियत देने के बाद भी बेवफाई की अपनी एक चाल है जो कई परिवारों में भीतर ही भीतर घुन की तरह खाए जाती है। फिर भी समाज और कानून के डर से वह खोखला परिवार बाहर से सुखी-संतुष्ट दिखने का स्वांग रचता रहता है। यह बेवफाई सीधे तौर पर वैवाहिक धोखाधड़ी के दायरे में नहीं आती, इसलिए कुछ समाजों में इसे प्रत्यक्षत: अपराध नहीं माना जाता। मामला खुल जाए तो कह-सुनकर या परिवार के भीतर बड़े-बुजुर्गो के साथ मिल-बैठकर बीच का कोई रास्ता निकालने की कोशिश भी की जाती है। इसके बाद भी अगर बात नहीं बनती तो मामला कोर्ट-कचहरी में पहुंचता है और ज्यादातर ऐसे मामलों में कानून की राय यह रही है कि मर्द ही इसका दोषी होता है।

यह सच है कि मांग उठ रही है कि बेवफाई यदि एकतरफा नहीं है, तो कानूनन सजा का सिर्फ एक छोर क्यों रहे। दूसरे छोर की बेवफाई के लिए स्त्री भी तो दंड की भागी बने। अभिप्राय यह निकलता है कि कानून को हल्का करने से विवाह संस्था की पवित्रता पर असर पड़ेगा और लोग बेवफाई को आतुर हो जाएंगे। असल में यह धारणा एक विडंबना ही है कि हमारे समाज में विवाह कानून के भय से टिके हैं न कि आपसी प्रेम और विश्वास के सहारे।

बहरहाल रिश्तों में टूटन की वजह कुछ भी हो, इतना तय है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में अब असंतोष की मात्र कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। ऐश्ले मेडिसन जैसे ये किस्से असल में हमें उन संकेतों की तरफ ले जा रहे हैं जो बताते हैं कि भारत के दांपत्य जीवन में भी अब पश्चिमी समाजों की जीवनशैलियों का घुन लग गया है। यह जीवनशैली खाओ-पीयो और मस्त रहो का संदेश देने के साथ व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाती है और खुद से परे दूसरों के सुख-दुख के बारे में सोचने से विरत करती है। कैसी विडंबना है कि इस जीवनशैली ने पहले हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर एकल परिवारों में बांटा और अब एकल परिवार भी टूट की कगार पर हैं।

नौकरी के तनाव और शहरों की भागमभाग जिंदगी के बीच परिवार का उपेक्षित होना और शादी से इतर संबंधों की खोज का यह सारा वाकया एक बड़े चलन में न तब्दील हो जाए- यही सबसे बड़ा खतरा है। समाजशास्त्रियों को ही नहीं, आम लोगों को भी यह बैठकर सोचना होगा कि शादीशुदा जिंदगी के ये असंतोष से और बेहतर पाने-खोजने की लालसा ऐसे अंतहीन दुष्परिणामों की तरफ लोगों को न ले जाए, जहां मजे देने वाला शुरुआती फरेब बाद की जिंदगी में सिर्फ हताशा और निराशा ही लाता है।

विवाहेतर संबंधों के संदर्भ में किए गए एक सर्वेक्षण में अनेक ऐसे तथ्य उभरकर सामने आए हैं जिससे पारंपरिक रूप से कायम विवाह नामक संस्था के खत्म होने का अंदेशा है

Posted By: Manish Pandey

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