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वेनेजुएला संकट के वैश्विक बनने के आसार

जिस देश के पास सऊदी अरब से भी ज़्यादा तेल हो, जिस देश की 95% इनकम तेल बेचकर होती हो, जिस देश में सोशलिस्ट सरकार गरीबों पर हाथ खोलकर खर्च करती हो, जिस देश में सरकार हर उद्योग को अपने मालिकाना हक में लेना चाहती हो और जिस देश पर अमेरिका-रूस-चीन जैसे देशों की निगाह पड़ जाए, उसका क्या होता है? उसका वही हाल होता है, जो आज वेनेजुएला का है। जानिए वेनेजुएला संकट के बारे में।


भूगोल बताता है कि धरती पर 195 देश हैं। इतिहास बताता है कि मानव सभ्यता विकसित होने के क्रम में कोई न कोई देश हमेशा मिट जाने की कगार पर खड़ा रहा है। कभी युद्ध की वजह से, कभी सिविल वॉर की वजह से, कभी अर्थव्यवस्था ठप होने की वजह से। 21वीं सदी की शुरुआत में यह दर्जा वेनेजुएला को हासिल है। वह लैटिन अमेरिकी देश, जिसने तेल के बूते अगाध संपन्नता देखी, लेकिन आज यहां लोगों के भूखे मरने की नौबत आ गई है।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ चार दिन पहले शुरू हुए प्रदर्शनों में 26 लोगों की मौत हो गई है. पीटीआई के मुताबिक प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए सेना बल प्रयोग कर रही है. यह दक्षिण अमेरिकी देश इन दिनों गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है. विपक्षी नेता खुआन गोइदो ने ख़ुद को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया है. अमेरिका के बाद ब्राजील और कोलंबिया जैसे कई पड़ोसी देशों ने उन्हें मान्यता भी दे दी है. यूरोपीय संघ ने भी वेनेज़ुएला में फिर से चुनाव कराए जाने की मांग कर दी है और गोइदो के नेतृत्व वाली नेशनल असेंबली को अपना समर्थन दे दिया है.

वेनेजुएला संकट समझने के लिए हमें इसके सियासी हालात से शुरुआत करनी होगी। आज की तारीख में यह साफ नहीं है कि वेनेजुएला का राष्ट्रपति कौन है। 2019 की शुरुआत में यहां राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए थे, जिसमें पहले से सत्ताधारी निकोलस मादुरो चुनाव जीत गए, लेकिन उन पर वोटों में गड़बड़ी करने का आरोप लगा। चुनाव में मादुरो के सामने खुआन गोइदो थे, जो इसी महीने संसद में विपक्ष के नेता बने हैं। इससे पहले तक उन्हें वर्ल्ड पॉलिटिक्स में कोई नहीं जानता था, लेकिन आज वह खुद को राष्ट्रपति बता रहे हैं।

उधर, निकोलस मादुरो ने सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया है. सेना उनके साथ है. रूस और चीन जैसे देश भी. मादुरो अमेरिकी राजनयिकों को वेनेज़ुएला छोड़ने का आदेश दे चुके हैं. लेकिन अमेरिका ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया है. उसका कहना है कि निकोलस मादुरो के पास अब ऐसा आदेश देने का अधिकार ही नहीं है.

चुनावी नतीजों के बाद मादुरो ने कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया, वहीं गोइदो का कहना है कि उनके पास अगला चुनाव न होने तक अंतरिम राष्ट्रपति बनने का संवैधानिक अधिकार है। गोइदो वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने पढ़ाई के दिनों में वेनेजुएला के पिछले राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के खिलाफ प्रदर्शन किया था। शावेज ने खुद ही मादुरो को अपना उत्तराधिकारी चुना था, जो उनकी तरह करिश्माई नेता साबित नहीं हो सके। वेनेजुएला आज जिस संकट से जूझ रहा है, उसमें मादुरो की विफल आर्थिक नीतियों का बड़ा हाथ है।

क्योंकि दुनिया के कई बड़े देशों ने वेनेजुएला को अपनी नाक का सवाल बना लिया है। एक तरफ मादुरो पर गद्दी छोड़ने का दबाव बढ़ रहा है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि मादुरो की सरकार नाजायज है और वह नैशनल असेंबली के अध्यक्ष गोइदो को ऑफीशियली वेनेजुएला का अंतरिम राष्ट्रपति स्वीकार करते हैं। अमेरिका मादुरो को ‘पूर्व राष्ट्रपति’ बता रहा है और वेनेजुएला की सेना से भी गोइदो का समर्थन करने के लिए कह रहा है, जो अभी तक मादुरो के पाले में खड़ी दिख रही है।
यानी वेनेजुएला की उथल-पुथल अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनातनी की वजह बन रही है. गुरुवार को रूस ने चेतावनी दी कि खुआन गोइदो का खुद को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित करना अराजकता और खूनखराबे का रास्ता है. रूसी सरकार द्वारा जारी एक बयान में यह भी कहा गया है कि इसके नतीजे विनाशकारी होंगे.

उधर, चीन ने भी कहा है कि वह वेनेजुएला में किसी दूसरे देश के दखल के खिलाफ है. गुरुवार को ही चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ख्वा चुनयिंग ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर कहा, ‘चीन अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता, स्वतंत्रता और स्थायित्व बचाए रखने के वेनेजुएला के प्रयासों का समर्थन करता है. चीन हमेशा से दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत पर चला है और हम वेनेज़ुएला में बाहरी मध्यस्थता का विरोध करते हैं.’

वेनेजुएला की ऐसी हालत हुई क्यों है

वेनेजुएला एक समय लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश था। वजह, इसके पास सऊदी अरब से भी ज़्यादा तेल है। सोने और हीरे की खदानें भी हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल पर टिकी है। सरकार की 95% इनकम तेल से ही होती रही। 1998 में राष्ट्रपति बने ह्यूगो शावेज ने लंबे समय तक कुर्सी पर बने रहने के लिए देश के सिस्टम में तमाम बदलाव किए। सरकारी और राजनीतिक बदलावों के अलावा शावेज ने उद्योगों का सरकारीकरण किया, प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ हल्ला बोल दिया, जहां भी पैसा कम पड़ा तो खूब कर्ज लिया और धीरे-धीरे देश कर्ज में डूबता चला गया। तेल कंपनियों से पैसा लेकर ज़रूरतमंद तबके पर खुलकर खर्च करने से शावेज मसीहा तो बन गए, लेकिन वेनेजुएला की इकॉनमी में दीमक लग गया।
2013 में शावेज ने मादुरो को अपना उत्तराधिकारी चुना, जिन्हें विरासत में भारी-भरकम कर्ज मिला। पॉलिटिक्स तो चरमरा ही रही थी, साथ में तेल की कीमतें भी गिर रही थीं। तेल सस्ता होने पर इनकम घटी और गरीबी बढ़ी, तो मादुरो ने करंसी की कीमत गिरा दी। इस कदम से भला तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन महंगाई ज़रूर बढ़ने लगी। जनता की जेब तो पहले से हल्की हो रही थी, अब उसके पेट पर भी लात पड़ने लगी। यहां से देश का आर्थिक और राजनीतिक बंटाधार होने लगा।

4. वेनेजुएला की बड़ी दिक्कतें
करंसी की कीमत घटना, बिजली कटौती और मूलभूत ज़रूरतों वाली चीज़ें महंगी होना। वेनेजुएला में हाइड्रो-पावर का बहुत यूज़ होता है। 2015 में पड़े सूखे की वजह से यहां बिजली का उत्पादन गिर गया। बिजली का संकट इतना बढ़ गया था कि अप्रैल 2016 में सरकार ने फैसला लिया कि अब से सरकारी दफ्तर सिर्फ सोमवार और मंगलवार को चलेंगे। नैशनल असेंबली के आंकड़े बताते हैं कि बीते एक साल में मुद्रा-स्फीति (इन्फ्लेशन) दर 13,00,000% हो गई है दिसंबर 2017 तक ही वेनेजुएला पर 14 हज़ार करोड़ डॉलर यानी करीब 9 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का विदेशी कर्ज हो चुका था। जुलाई 2018 में सालाना महंगाई दर 83,000% तक पहुंच गई। वेनेजुएला के पास सऊदी से ज़्यादा तेल है, लेकिन भारी तेल होने के चलते इसे रिफाइन करने में ज़्यादा खर्च आता है। वहां तेल कंपनियां सरकारी तो हो गई हैं, लेकिन तेल उत्पादन कम हो रहा है, जिससे रोजगार और आमदमी का सवाल खड़ा हो गया है।
आम जनता का क्या हाल है
जब तक वेनेजुएला में तेल बेच-बेचकर पैसा आ रहा था और शावेज जनता पर पैसा बरसा रहे थे, तब तक सब ठीक था। हालांकि, अर्थशास्त्री तब भी ‘शावेज की सोशलिस्ट पॉलिसी’ को खतरा बता रहे थे, लेकिन तब सबसे कानों में तेल पड़ा हुआ था। आज वेनेजुएला की करंसी बोलिवर का आलम यह है कि लोग एक किलो मीट के लिए 3 लाख बोलिवर तक दे रहे हैं। एक कप कॉफी के लिए 50 हज़ार बोलिवर तक दे रहे हैं। औरतें अपने बाल बेचकर पैसे इकट्ठा कर रही हैं। हर 35 दिनों में चीज़ों के दाम दोगुने हो रहे हैं। आज यहां 5 में से 4 लोग गरीब हैं। होटल-रेस्ट्रॉन्ट में लोग अपना बैंक बैलेंस दिखा रहा है कि उनके पास पेमेंट करने के लिए पैसे हैं। जिनके पास खाने का पैसा नहीं, वो लूट-मार कर रहे हैं। 2014 से अब तक कुल 23 लाख लोग देश छोड़ चुके हैं, जिनमें से करीब 10 लाख कोलंबिया गए हैं। 23-24 जनवरी को मादुरो के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन में गोलीबारी हुई, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई। 2014 से अब तक पेट्रोल कीमतें 6000% से ज़्यादा बढ़ चुकी हैं। तेल का उत्पादन 30 लाख बैरल से ढाई लाख बैरल पर पहुंच गया है। हर 21 मिनट में एक मर्डर होता है। 1 सितंबर 2018 से एक दिन का मेहनताना 34 गुना बढ़ा दिया है, जिसका भुगतान करने की क्षमता कंपनियों के पास नहीं है। राशन लेने के लिए लोग 65-65 घंटे कतार में खड़े होते हैं। गोदामों के बाहर सैनिक तैनात रहते हैं।

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