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जेल की सलाखों के पीछे रिहाई की टकटकी लगाए बूढ़ी आंखों में फिर लौटी उम्मीद की किरण

 

यूपी के फतेहपुर के रहने वाले 92 साल के लाल सिंह की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही है। उन्हें चलने-फिरने में भी दिक्कत होती है। वह हत्या के एक मामले में सजा मिलने के बाद पिछले करीब 20 सालों से नैनी जेल में बंद हैं। बांदा के बाबू शिवमंगल की उम्र भी करीब 92 साल है। वह भी हत्या के मामले में सजा मिलने पर नैनी जेल लाए गए थे। करीब 20 साल की सजा काट चुके हैं।90 साल या उससे अधिक की उम्र वाले 12 कैदी इस समय नैनी जेल में बंद हैं, जो अब अपराध करना तो दूर अपराध करने की सोच भी नहीं सकते। हालांकि, प्रदेश में ऐसे बंदियों की रिहाई के लिए कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण उनकी रिहाई अधर में लटकी हुई है। ऐसे बंदियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कई बार राज्य सरकार को फटकार लगाई और समय देते हुए स्पष्ट नीति बनाने का आदेश दिया। हाई कोर्ट की फटकार के बाद अब इसे लेकर नीति बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

सूत्रों के मुताबिक, इसका ड्रॉफ्ट करीब-करीब फाइनल हो चुका है। कुछ संशोधनों के बाद इसे दोबारा राज्यपाल के पास भेजे जाने की उम्मीद है। पहली बार राज्यपाल ने कुछ बिंदुओं पर आपत्ति के साथ इसे सरकार को वापस कर दिया था। हालांकि, अगले साल जनवरी से पहले इस नीति के अमल में आने की उम्मीद कम ही है।

गांधी जयंती पर रिहाई की केंद्र की पहल

गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के अवसर देश में बड़े पैमाने पर कैदियों की रिहाई होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में अपनी आधी से अधिक सजा काट चुके उम्रदराज और दिव्यांग कैदियों को तीन चरणों में रिहा किए जाने का निर्णय लिया गया था। पहले चरण में एक तिहाई कैदियों को दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन इसके बाद अगले साल 10 अप्रैल को चंपारण सत्याग्रह की वर्षगांठ के अवसर पर एक तिहाई और शेष एक तिहाई कैदियों की रिहाई उसके बाद दो अक्टूबर को की जानी है।

इसके लिए केंद्र जल्द ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जरूरी दिशानिर्देश जारी करेगा। हालांकि, रिहाई को लेकर कई शर्तें भी हैं और प्रदेश की जेलों में अब तक इससे संबंधित कोई दस्तावेज नहीं पहुंचा है, जिससे कैदियों की पहचान शुरू की जा सके।

अचानक बढ़ जाती है कैदियों की मृत्यु दर

इलाहाबाद परिक्षेत्र के डीआईजी और नैनी जेल के वरिष्ठ अधीक्षक बीआर वर्मा बताते हैं कि वर्षों से 15 अगस्त और 26 जनवरी के अवसर पर वृद्ध और अशक्त कैदियों की प्रीमेच्यौर रिहाई की परंपरा रही है। ऐसे बंदी अब भी इन तारीखों पर रिहाई की आस देखते रहते हैं और आदेश न आने की स्थिति में अचानक जेल में ऐसे कैदियों की मृत्यु दर बढ़ जाती है, जो जेल प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, इस पर नीति बन जाने से काफी राहत मिलेगी।

नैनी जेल में 262 बुजुर्ग कैदी काट रहे हैं सजा

प्रदेश की करीब-करीब हर जेल में क्षमता से अधिक कैदी हैं। बावजूद इसके करीब 15 साल से 15 अगस्त और 26 जनवरी पर होने वाली वृद्ध व असक्त सजायाफ्ता कैदियों की प्रीमेच्यौर रिहाई बंद है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार को इसके लिए एक स्पष्ट नीति बनाई थी लेकिन स्पष्ट नीति ना होने के कारण कैदियों की रिहाई नहीं हो पा रही है।

यूपी की सबसे बड़ी जेलों में शुमार नैनी जेल में 1,800 के करीब सजायाफ्ता कैदी हैं। इनमें करीब 1,500 कैदी ऐसे हैं जिन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली हुई है। इन कैदियों में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 262, 70 से 80 वर्ष के बीच वाले 124 और 80 वर्ष से अधिक उम्र के 25 कैदी शामिल हैं। दर्जन भर कैदी तो ऐसे हैं जो न ठीक से देख सकते हैं न चल-फिर सकते हैं।

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