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जो सरकारी जमीन बिक ही नहीं सकती थी, उसे राम मंदिर ट्रस्ट ने ख़रीदा कैसे

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जमीन खरीदने का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. कुछ दिन पहले ही सपा, आम आदमी पार्टी समेत यूपी की विपक्षी पार्टियों ने जमीन खरीद में घोटालों के आरोप लगाए थे. तब कहा गया था कि एक ही जमीन को कुछ मिनटों के अंतराल में 16 करोड़ रुपए ज्यादा में खरीद लिया गया. इस पर राम मंदिर ट्रस्ट ने सफाई भी दी थी. अब खुलासा हुआ है कि राम मंदिर ट्रस्ट ने कथित तौर पर नजूल की जमीन को ढाई करोड़ में खरीद लिया है. ऐसे में ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या राम मंदिर ट्रस्ट ने जमीन खरीदने से पहले यह नहीं देखा कि उस जमीन का इतिहास क्या है. आइए जानते हैं पूरा मामला.

20 लाख की जमीन ढाई करोड़ में खरीदी!

जमीन खरीद विवाद पर लग रहे आरोपों की पड़ताल ‘आजतक-इंडिया टुडे’ ने अयोध्या जाकर की. इस पड़ताल में कई खुलासे हुए. पता चला कि अयोध्या में जिस जगह पर श्रीराम मंदिर के पास की जमीन को काफी ऊंचे दामों पर खरीदा गया है, वह राम मंदिर निर्माण स्थल से लगभग 300 मीटर की दूरी पर कोट रामचंदर इलाके में है. इस जमीन को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने ढाई करोड़ रुपये में खरीदा है. विपक्ष ने इस जमीन को लेकर आरोप लगाए हैं. ‘आजतक’ के पास मौजूद जमीन की रजिस्ट्री के कागजातों के मुताबिक, अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीपनारायण उपाध्याय ने यह जमीन देवेंद्र प्रसादाचार्य से 20 लाख रुपये में खरीदी थी. और कुछ महीनों बाद ही ट्रस्ट को ढाई करोड़ रुपये में बेच दी.

ट्रस्ट ने कैसे खरीद ली नजूल की जमीन?

‘आजतक’ की तहकीकात में एक बड़ा खुलासा ये हुआ है कि यह जमीन सरकारी है. इसे तब तक बेचा नहीं जा सकता, जब तक यह जमीन फ्री-होल्ड न हो जाए. आजतक के खुफिया कैमरे पर इस बात की तस्दीक अयोध्या के सब-रजिस्ट्रार एस. बी. सिंह ने भी की है. उन्होंने कहा,

”नजूल जमीन सरकारी होती है इसलिए इसे बेचा नहीं जा सकता, जब तक कि यह फ्री-होल्ड न हो जाए. आप उसको इंजॉय कर सकते हैं, लेकिन इस पर मालिकाना हक नहीं जता सकते. सड़क किनारे भी नजूल जमीन में ढाबे बने होते हैं. लेकिन जब भी जरूरत होती है तो उसे गिरा दिया जाता है. इसलिए नजूल जमीन की या किसी जमीन की रजिस्ट्री तो हो जाएगी, क्योंकि हमारी जिम्मेदारी लेखपत्र की नहीं होती, लेकिन नजूल की सरकारी जमीन पर खरीदने वाले का मालिकाना हक नहीं होगा, जब तक कि जमीन दाखिल-खारिज न हो जाए.”

एस. बी. सिंह ने आगे कहा,

”अगर इस तरह नजूल या विवादित जमीन की रजिस्ट्री करा ली गई है तो जमीन खरीदने वाला कोर्ट में केस करके सिर्फ अपने दिए पैसे ही वापस ले सकता है. अब किस तरह ट्रस्ट ने बिना जांच पड़ताल किए जमीन खरीद ली, यह ट्रस्ट ही बता सकता है. लेकिन सरकारी जमीन पर बिना फ्री-होल्ड हुए मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं हो सकता. जहां तक रजिस्ट्री का सवाल है तो ट्रस्ट ने दो बार रजिस्ट्री क्यों करवाई, यह ट्रस्ट के जानने का काम है. हमें तो स्टाम्प मिला, जितनी बार रजिस्ट्री होगी, उतना स्टाम्प का पैसा हमें मिलेगा. हो सकता है कि  इस मामले में कई लोग हों और ट्रस्ट ने सोचा हो कि एक को ही मैनेज करें, सारे मेढकों को तराजू में कैसे तौलें.”

सब-रजिस्ट्रार एस. बी. सिंह के मुताबिक, किसी भी जमीन की रजिस्ट्री हो सकती है, भले ही वह बाद में सरकारी या विवादित निकले. यह जिम्मेदारी तो जमीन खरीदने वाले यानी इस मामले में राम मंदिर ट्रस्ट की है कि पता करे कि जमीन का स्टेटस क्या है. उन्होंने कहा,

”हर खरीदार की जिम्मेदारी है कि वह जमीन की पड़ताल कराकर ही जमीन की रजिस्ट्री कराए.”

अब सवाल यह उठता है कि राम मंदिर ट्रस्ट ने बिना किसी जांच पड़ताल के राम मंदिर के नाम पर आए चंदे के करोड़ों रुपयों से विवादित जमीन कैसे और क्यों खरीद ली? वहीं, अयोध्या के महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य का कहना है कि अयोध्या के मेयर और उनके भांजे ने राम मंदिर के लिए जमीन लेने की बात की थी. इसके बाद हमने सरकारी जमीन होने के नाते इसे 20 लाख रुपए में उनको बेच दिया. हमें तो पता ही नहीं कि इसी जमीन को 3 महीने बाद ही उन लोगों ने ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दिया.

जमीन बेचने वाले मेयर के रिश्तेदार

जिन 2 बड़ी जमीनों को ट्रस्ट ने खरीदा है, उन्हें बेचने वालों से अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय का सीधा कनेक्शन जुड़ता दिख रहा है. उनके 2 रिश्तेदारों ने ये जमीनें राम मंदिर ट्रस्ट को बेची हैं. इनमें से एक है उनका भांजा दीपनारायण उपाध्याय. और दूसरा है करीबी रिश्तेदार रवि तिवारी. अब विपक्ष के साथ ही 20 लाख में मेयर के रिश्तेदार को जमीन बेचने वाले महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य ने भी मेयर पर सीधा-सीधा सवाल उठा दिया है. जबसे जमीन की खरीद-फरोख्त में मेयर ऋषिकेश उपाध्याय का नाम आया है, वह मीडिया से बात करने से बच रहे हैं. जब ‘आजतक’ ने कड़ी मशक्कत के बाद मेयर को खोज निकाला तो वह कैमरा देखते ही आरोपों का जबाव देने के बजाए निकल गए.

हरीश पाठक पूरे ‘खेल’ की अहम कड़ी

इस पूरे खेल में एक और अहम किरदार है, जिसका नाम है हरीश पाठक उर्फ हरिदास. पाठक पर अयोध्या में ठगी के कई मामले दर्ज हैं. हैरानी की बात यह कि पुलिस के रिकॉर्ड में वह फरार है, लेकिन इसके बाद भी उसका रजिस्ट्री ऑफिस आना-जाना लगातार बना रहा. आजतक की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि ट्रस्ट द्वारा खरीदी हर जमीन में कहीं-न-कहीं हरीश पाठक के तार जुड़े हुए हैं. आजतक के मुताबिक, हरीश पाठक ने 25 फरवरी 2009 को फैजाबाद में साकेत गोट फार्मिंग के नाम से एक चिट फंड कंपनी खोली. लगभग 7 साल बाद लोगों से जमा कराए करोड़ों लेकर भाग निकला. अलग-अलग जिलों में इसके नाम धोखाधड़ी और जालसाजी के मुकदमे दर्ज हुए. उसकी संपत्ति की कुर्की कर दी गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आया. धोखाधड़ी से कमाए पैसे को उसने जमीन की खरीद-फरोख्त में इस्तेमाल किया. अयोध्या रजिस्ट्री ऑफिस के सब रजिस्ट्रार एस बी सिंह ने आजतक से दावा किया कि हरीश पाठक जो पैसे लेकर भाग निकला था, उसी को जमीन में लगाकर पूरा कारोबार खड़ा कर लिया.

हरीश पाठक का सुल्तान अंसारी से क्या कनेक्शन?

जिस शख्स सुल्तान अंसारी का नाम ट्रस्ट द्वारा 2 करोड़ की जमीन कई करोड़ में खरीदने के बाद उछला, वह इरफान अंसारी का बेटा है. इरफान अंसारी भी हरीश पाठक का करीबी रहा है. हरीश पाठक ने जब चिट फंड कंपनी शुरू की थी तो इरफान अंसारी उसके कामकाज में हाथ भी बंटाता था. हरीश पाठक ने साल 2011 में इरफान के साथ मिलकर 1 करोड़ रुपए में विवादित जमीन का एग्रीमेंट करवाया. साल 2017 में इसकी रजिस्ट्री भी करवा ली. इसी जमीन का 2019 में इरफान के बेटे सुल्तान अंसारी समेत 9 लोगों को 2 करोड़ में एग्रीमेन्ट कर दिया गया. यही जमीन 18 मार्च 2021 को राम मंदिर ट्रस्ट को दो टुकड़ों में बेची गई. एक 18.5 करोड़ में और दूसरी 8 करोड़ रुपए में. मतलब 2 करोड़ रुपए की जमीन के लिए तकरीबन साढ़े 26 करोड़ रुपए चुकाए गए. बात यहीं खत्म नहीं हुई. ट्रस्ट से मिले पैसे से इसने इरफान अंसारी के ही बेटे सुल्तान अंसारी और अयोध्या मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के करीबी रिश्तेदार रवि तिवारी के साथ फिर से 11 करोड़ 1 लाख की बड़ी विवादित जमीन राम मंदिर से एक किलोमीटर दूर खरीद ली.

अयोध्या पहुंची IB की टीम

हरीश पाठक उर्फ हरिदास के फरार होने को लेकर अयोध्या पुलिस का रवैया अब भी ढीला ही नजर आता है. जब आजतक ने कैंट कोतवाली में हरीश पाठक के खुलेआम घूमने की बात पूछी तो कैंट थाने के दीवान ने बताया कि

“ऐसे कितने ही मामले हैं, जिनकी पहले कोई चर्चा नहीं थी. अब कागज निकाले जा रहे हैं. हमारे यहां से दो मुकदमों में फरार है, जिसमें एक मुकदमे से तो जांच अधिकारी ने 2 धाराएं ही हटा दी थीं और बिना 141 के नोटिस के चार्जशीट दाखिल कर दी”

अब मामले में अयोध्या के एसएसपी सबकी क्लास लगा रहे हैं. केस की फाइल दफ्तर में मंगवा रहे हैं. बताते हैं, मामला प्रधानमंत्री तक पहुंच गया है. इसके बाद अयोध्या में आईबी की टीम पहुंची है. सभी अफसरों से फाइलें मंगवाई जा रही हैं. खासकर उस सरकारी दफ्तर से जो सरकारी जमीनों का मामला देखता है. देखना है कि आगे क्या सामने आता है.

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Written by Chetan Shukla

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